शांति परियोजना की राह में खतरे भी कम नहीं

तुर्कमेनिस्तान ने भले ही तापी गैस पाइपलाइन को शांति और स्थिरता परियोजना (पीस एंड स्टेबिलिटी प्रोजेक्ट) का नाम दिया हो, लेकिन 1814 किमी लम्बी इस पाइपलाइन के भारत के फाजिल्का तक पहुंचने में खतरे भी हैं। यह गैस पाइपलाइन तालिबान के गढ़ अफगानिस्तान के कंधार और पाक के क्वेटा के पास से गुजरेगी। इसके अलावा दिसम्बर 2019 तक पूरी होने वाली इस परियोजना पर सरहदी मुल्क भारत-पाक के बनते-बिगड़ते रिश्तों का असर भी आ सकता है।
भारत ने पिछले दो दशक से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की कोशिशों को तेज किया है। पहले इरान से पाक के रास्ते भारत में गैस लाने के लिए आईपीआई गैस पाइपलाइन परियोजना बनी, जो सिरे नहीं चढ़ी। इसके बाद ओमान और भारत के बीच इरान के समुद्री रास्ते गैस लाने की परिेयोजना बनी। पाकिस्तान से खट्टे-मीठे अनुभव और रिश्तों के चलते भारत खुद पाक की सरजमीं के बजाए इरानी समुद्री रास्ते से गैस लाने का पक्षधर है।
पहले समुद्री रास्ता बेहद खर्चीला था, लेकिन बदलती तकनीक के इस दौर में समुद्री रास्ते से पाइपलाइन बहुत मुश्किल नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसकी संभावनाएं तलाशने के लिए कह चुके हैं। इसकी वजह भी हैं। अफगानिस्तान और पाक के रास्ते पाइपलाइन लाना खतरों से भरा है। यह इससे भी साबित होता है कि 46 बिलियन डॉलर की चाइना पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर में तालिबान विद्रोहियों ने पाक में चीन के कर्मचारियों पर प्राणघातक हमले किए और फिरौती के लिए इनका अपहरण भी किया।
हालात यह हैं कि पाकिस्तान को करीब आठ हजार चाइनीज कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए दस हजार से Óयादा की स्पेशल फोर्स बनानी पड़ी है। ऐसे में तापी गैस पाइपलाइन में काम करने वाले कर्मचारियों को विद्रोही तालिबानियों से सुरक्षा देना इन देशों की पहली जिम्मेदारी होगी। काबिलेगौर है कि एक अमेरिकन कंपनी ने तापी परियोजना में काम करने में दिलचस्पी दिखाई तो तालिबान ने संकेत दिए कि उन्हें डॉलर देने पर ही कर्मचारी सुरक्षित रह पाएंगे।
ऐसा भी नहीं है कि संभावित खतरों से देश अंजान हैं। तभी तो तापी गैस परियोजना की आधारशिला रखते हुए उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने चेताया कि परियोजना में शामिल सभी देशों को प्रोजेक्ट की सफलता का विरोध करने वाली विद्रोही ताकतों का मिलकर सामना करना होगा।
परियोजना का उजला पक्ष यह भी है कि चार साल में इसके पूरा होने के बाद चारों देश तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के करीब डेढ़ अरब लोगों की तीस साल तक ऊर्जा जरूरतें इससे पूरी हो सकेंगी। आधारशिला स्थल मरी में ऑयल एंड गैस फील्ड से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं तापी इज ए हिस्टोरिक प्रोजेक्ट…बट बिग इश्यु इज सिक्योरिटी।
तापी पाइपलाइन एक नजर 2002 : इस्लामाबाद में तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान ने किए हस्ताक्षर एशियाई विकास बैंक की टीम ने पहली बार किया परियोजना का अध्ययन 2006 : भारत ने तापी गैस परियोजना से जुडऩे की मंशा जताई 2008 : तापी गैस पाइपलाइन परियोजना से भारत स्थायी तौर पर जुड़ा तुर्कमेनिस्तान – 214 किमी अफगानिस्तान – 774 किमी पाकिस्तान – 826 किमी 1814 किमी कुल लंबाईtapi

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