क्या है OROP, क्यों की गई मांग

ओआरओपी का सीधा मतलब है कि समान सेवा अवधि के साथ समान रैंक में सेवानिवृत्त होने वाले सैन्य कर्मियों को चाहे उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख कुछ भी हो, समान पेंशन का भुगतान किया जाएगा। पेंशन की दरों में किसी प्रकार की भावी बढ़ोत्तरी स्वत: पूर्व पेंशनधारकों के लिए लागू हो जाएगी। इस प्रकार एक निश्चित अंतराल पर मौजूदा पेंशनधारक व पूर्व पेंशनधारक की पेंशन के बीच की विसंगति समाप्त हो जाएगी। कितनी संख्या 24.25 लाख पंजीकृत पूर्व सैनिक 13 लाख से ज्यादा सेवारत सैनिक क्यों की गई मांग -प्रशासनिक कर्मी 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं। सैन्य कर्मी कहीं (रैंक आधारित) जल्दी और ऐसे समय रिटायर होते हैं जब पारिवारिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है और नौकरी के दूसरे मौके मुश्किल से मिलते हैं। -सिपाही 35-38 साल में, एनसीओ और जेसीओ 40-45 (सिर्फ 10% सिपाही जेसीओ बन पाते हैं) साल में अवकाश ग्रहण करते हैं। -अधिकतर अधिकारी 50 वर्ष से पहले रिटायर हो जाते हैं (कुछ ही लेफ्टिनेंट जनरल/एअर मार्शल/वाइस एडमिरल 60 साल तक सेवारत रहते हैं) -सैन्य सेवा की शर्तें प्रशासनिक सेवा के कर्मचारियों के मुकाबले ज्यादा कठिन होती हैं। -सैनिकों को मुश्किलों भरी पोस्टिंग मिलती है। जान पर खतरा बना रहता है। मौलिक अधिकारों पर पाबंदी होती है। दिक्कतें क्या थीं वित्तीय- पूर्ण ओआरओपी देना सरकार के पेंशन बिल में और दिक्कतें पैदा करता। कानूनी- इसी तरह की मांग अन्य केंद्रीय कर्मियों विशेषकर अर्धसैनिक बल के कर्मी करने लगेंगे। ओआरओपी का इतिहास 1973 तक: सशस्त्र बलों में ओआरओपी लागू था, प्रशासनिक अधिकारियों से अधिक उन्हें मिलता था। 1973 तीसरा वेतन आयोग: सैन्य और प्रशासनिक भुगतान में समानता। सितंबर 2009: सुप्रीम कोर्ट का ओआरपीओ सिद्धांतों का पालन करने का निर्देश। मई 2010 रक्षा स्थायी समिति ने लागू करने की सिफारिश की। सितंबर 2013 भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी का इसे लागू करने का वादा। फरवरी 2014 यूपीए सरकार ने अमलीकरण के लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए। जुलाई 2014 एनडीए सरकार ने ओआरओपी के लिए प्रतिबद्धता दुहराई, अपने पहले पूर्ण बजट में 1,000 करोड़ रुपये आवंटित किए। फरवरी 2015 सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इसे तीन माह में लागू करने को कहा।

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