जानिए भारत में क्या है फांसी की सज़ा देने और अपील की प्रक्रिया ?

cropped-logo-new.jpgभारत में दुर्लभतम मामलों में मौत की सज़ा दी जाती है. सेशन कोर्ट (सत्र न्यायालय) में जब मुक़दमे की सुनवाई होती है तो सेशन जज को फ़ैसले में ये लिखना पड़ता है कि मामले को दुर्लभतम (रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर) क्यों माना जा रहा है. इसलिए बहुत घिनौने तरीक़े के अपराधों में ही ऐसी सज़ा दी जाती है. जैसे, निहत्थों, बच्चों या महिलाओं के साथ किए गए बेहद क्रूर अपराध इसके तहत माने जा सकते हैं. लेकिन सेशन जज मृत्युदंड की सज़ा सुना दे, तो भी इसे तबतक वैध नहीं माना जाता जब हाई कोर्ट की अपील में मंजूरी न मिल जाए, यानी ये एक दोहरी व्यवस्था क़ायम की गई है. किसी को मौत की सज़ा तभी मिल सकती है जब सेशन कोर्ट भी उस मामले को ‘द रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर’ माने और उसके बाद हाई कोर्ट भी मामले को यही मानकर सज़ा दे. सेशन कोर्ट में जब मृत्युदंड दिया गया हो तो उसके ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील करने को रिफ्रेंस कहते हैं. रिफ़्रेंस के दौरान दो जज सभी सबूतों को दोबारा देखते हैं. अगर ये दोनों जज मानते हैं कि ये एक ऐसा जुर्म है जिसके लिए मृत्युदंड के अलावा कोई दूसरी सज़ा काफ़ी नहीं है, तभी मौत की सज़ा सुनाई जाती है. अभियुक्त हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में भी अपील कर सकता है. अगर सुप्रीम कोर्ट का भी फ़ैसला अभियुक्त के ख़िलाफ हो तो राज्यपाल या राष्ट्रपति से मृत्युदंड माफ़ करने की अर्जी दी जा सकती है. और जब तक इस अर्जी पर फ़ैसला न आ जाए दोषी को मौत की सज़ा नहीं दी जा सकती. राष्ट्रपति मृत्युदंड की सज़ा माफ़ कर सकते हैं. साथ ही जिस राज्य की अदालत ने मौत की सज़ा दी है वहाँ के राज्यपाल के पास भी माफ़ी देने का क़ानूनी अधिकार है. वो दोबारा माफ़ी के लिए कह सकते हैं. इंसान जब तक ज़िंदा है, वो जीने की चाह रखता है और उसके लिए जो भी संभव क़दम है वो उठाता है. अमरीका में तो देखा गया है कि कई बार मृत्युदंड देने से पहले रात को भी माफ़ी याचिका दायर हो जाती है और उसपर फिर विचार होता है. मुझे इस मामले के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है इसलिए ठोस रूप से नहीं कह सकता. याक़ूब बहुत दिनों से जेल में बंद हैं तो वो मानसिक रूप से स्वस्थ न होने की बात कह सकते हैं. लेकिन इसके लिए चिकित्सीय सबूत की ज़रूरत होगी. जो दिमाग़ी रूप से सेहतमंद न हो उसे मौत की सज़ा देना सही नहीं माना जाता. भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि जिस इंसान का दिमाग़ सामान्य नहीं है उसे मौत की सज़ा देना क्रूरता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में दिशा-निर्देश तय किए हैं. जैसे जिसे मौत की सज़ा दी जा रही हो उसके रिश्तेदारों को कम से कम 10 दिन पहले ख़बर मिल जानी चाहिए ताकि वो आकर मिल सकें. ये भी व्यवस्था होनी चाहिए कि सज़ा पाने वाले व्यक्ति के रिश्तेदार उस व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर सकें.

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